
दिल्ली
सिपाहियों का दूसरा सबसे बड़ा अड्डा मेरठ में था
- जहां पर 2300 भारतीय सिपाही 2000 ब्रिटिश सिपाही और 12 तोपों थी।
- सिपाही बंगाल की सेना के असंतोष को जानते थे।
- इनके अलावा घुड़सवार दस्ते भी मौजूद थे।
घुड़सवार दस्ते के सेनानायक लेफ्टिनेंट जॉर्ज स्मिथ ने परेड और फायरिंग के अभ्यास का आदेश दिया
- 24 अप्रैल को 5 सिपाही सीधे परेड के मैदान में खड़ा हुए और कहा कि हम आपका आदेश मानने से इनकार करते हैं।
- 9 मई को 85 सिपाहियों को गिरफ्तार कर 10 वर्ष की कठोर कारावास की सजा दिया गया।
विद्रोहियों को पता था कि अगला दिन (10 मई) रविवार है ,इस दिन इसाई लोग आराम फरमाते हैं तो विद्रोहियों ने फैसला किया कि हम सिपाहियों को छुड़ाने का काम इसी रविवार को करेंगे।
इसी वक्त मेरठ में तीसरी बंगाल केवलरी रेजीमेंट के लोगों ने हमला किया और 800 से अधिक लोगों को छुड़ा लिया।
इसमें दूसरी बंगाल नेटिव इन्फेंट्री को भी शामिल होना पड़ा।
सारे अंग्रेजी सैनिकों को विद्रोहियों ने मार डाला।
विद्रोहियों ने सारे तोपखाने को अपने कब्जे में ले लिया और 11 मई को जब अंग्रेज लड़ने को तैयार हुए तब तक सारे विद्रोही दिल्ली की तरफ रवाना हो चुके थे।
- इन विद्रोहियों का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों को मारकर दिल्ली की तरफ जाना था
- इन विद्रोहियों को दिल्ली पहुंचने में वक्त लगा।
- दिल्ली पहुंचकर विद्रोही बहादुरशाह जफर के दरबार में हाजिर हुए
बहादुर शाह जफर को दिल्ली में संकुचित कर दिया गया था और कहा गया था कि आपके मरने के बाद कोई राजा या बादशाह नहीं बनेगा।
- बहादुर शाह जफर ने विद्रोहियों का साथ दिया और
- अपने सेनापति बख्त खान को सैनिकों के लिए सारा सामान इंतजाम करने को कहा।
- पूरी दिल्ली में विद्रोह फैल चुका था
- बहादुर शाह के सोचने से पहले ही उसके नौकरों ने महल के बाहर मौजूद सभी अंग्रेजों को खत्म कर दिया।
- अंग्रेजों ने तत्काल दिल्ली छोड़ दी।
- केवल हिंदुस्तान को बचाने वाले लोग ही सड़कों और गलियों में दिख रहे थे।
अगले दिन दोपहर में एक जबरदस्त धमाका हुआ विद्रोहियों ने अंग्रेजों के गोला बारूद भंडार में आग लगा दी थी। वह काफी अंग्रेज मरे और कुछ घायल हो गए। उनकी लाशों को सड़कों पर फेंक दिया गया।
- अब विद्रोह खुलेआम हो रहा था।
- हर हिंदू मुस्लिम विद्रोहियों का साथ दे रहे थे और आग धीरे-धीरे आगरा तक फैल चुकी थी।
- अवध के नवाब ने बहादुरशाह जफर को सैनिक सहायता देने का वादा किया था लेकिन बाद में मुकर गए
- मराठों का एक भाग विद्रोहियों के साथ था जबकि दूसरा भाग विद्रोह कर रहा था।
- जमींदारों में से कुछ अंग्रेजों का साथ दे रहे थे।
- जमींदारों की मदद से अंग्रेजों ने विद्रोहियों को ढूंढ ढूंढ कर मारना शुरू किया।
- विद्रोहियों को कुचलने में भी इन जमींदारों ने काफी मदद की।
विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने पंजाब और उत्तर पश्चिम क्षेत्र के सैनिकों को भेजा और कहा कि विद्रोह दवा दिया जाए और
- दिल्ली पर अंग्रेजों का पूरा अधिकार हो गया।
- लाल किला को चारों तरफ से घेर लिया गया। कुछ की
- दीवारें तोड़ दी गई।
- बहादुर शाह जफर की पत्नी को कैद कर लिया गया।
- उनकी पत्नी से बहादुर शाह जफर का पता पूछने पर पता चला कि बहादुर शाह जफर अपने दो लड़के और एक पोते के साथ हुमायूं के मकबरे के तहखाने में छुपे हुए हैं।
- अंग्रेज सैनिक ने उन्हें घसीटते हुए बाहर निकाला
- बेरहमी से मारते हुए लाल किले तक लाए
- उनके पुत्र और पोते को गोली मार दी गई और लाल लाल किले पर लटका दी गई।
- बहादुर शाह जफर और उनकी पत्नी को तुरंत उनके प्रभाव से निलंबित कर दिया गया और आजीवन कारावास में भेज दिया जहां दोनों की मौत हो गई।
- सारी व्यवस्था खत्म करके सारा लाल किला लूट लिया गया और दिल्ली में सारे हिंदू मुस्लिमों का कत्लेआम कर दिया गया।
- कानपुर की कमान नाना साहब संभाल रहे थे
- कानपुर में काफी बड़ी संख्या में अंग्रेजी सैनिक मौजूद थे
- ग्रैंड ट्रंक रोड जो यहीं से गुजरता था और सिंध, पंजाब, और अवध को जोड़ता था
- 1857 का विद्रोह काफी हद तक कानपुर से प्रभावित था
- यहां पर अंग्रेजो के 84 वीं 32 वीं रेजीमेंट के सैनिक थे जो लखनऊ से भी ताल्लुक रखते थे
- कानपुर के फतेहगढ़ में गंगा के किनारे विद्रोह शुरू हुआ और देखते देखते पूरे कानपुर में फैल गया
- 31 मई 1857 को दो अंग्रेजी अधिकारियों पर हमला होता है और उन्हें खत्म कर दिया जाता है
- सारे विद्रोही एक तरफ हो जाते हैं
- 2 जून को जब अंग्रेज हमला करते हैं तो हालत और बिगड़ जाती है
कानपुर में 53 वीं , पहली और 56 वीं नेटिव इन्फेंट्री के सैनिक मौजूद थे , इसके अलावे दूसरी बंगाल नेटिव इन्फेंट्री के सैनिक भी मौजूद थे, सारे अपने आप को सुरक्षित करने में लग गए
- इसी दौरान लेफ्टिनेंट कॉक्स ने एक गलती कर दी
- 2 जून को शराब पीकर लेफ्टिनेंट कॉक्स ने गोली चलाई और कुछ लोग मारे गए
- 5 जून 1857 की रात में विद्रोह शुरू हुआ ,150 सिपाही अंग्रेज़ अधिकारी व्हीलर के साथ मिल गए
नाना साहब अभी भी विद्रोह से दूर थे
- नाना साहब बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र थे
- नाना साहब के दीवान का नाम अजीमुल्ला खान था
- नाना साहब ने अजीमुल्ला खान को एक याचिका के साथ ब्रिटिश महारानी के पास भेजा था
- यह याचिका दत्तक पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी न बनने देने के विरोध में था
रानी इनकी याचिका को ठुकरा देती है और नाना साहब विद्रोह में भाग लेने का फैसला करते हैं
उन्होंने अंग्रेजी अधिकारियों के खजाने पर अपना अधिकार किया और विद्रोही सैनिकों से कल्याणपुर में मिलकर उनका साथ देने का वादा किया
- 6 जून 1857 को नाना साहब ने अंग्रेजी अधिकारी व्हीलर पर आक्रमण किया
- इस आक्रमण में व्हीलर सभी गोला बारूद छोड़ कर भाग जाता है
- व्हीलर के सारे अधिकार क्षेत्रों पर नाना साहब का अधिकार हो जाता है और नाना साहब अब दिल्ली की तरफ रवाना होते हैं
गर्मी का मौसम होने के कारण स्मॉल पॉक्स, उल्टी, कॉलरा और दवाइयों की कमी ने नाना साहब और उनके साथियों की कमर तोड़ कर रख दी
- 23 जून तक उनकी हालत बिल्कुल खराब हो गया
- 24 जून को ब्रिटिश गैरिसन को भारी नुकसान हुआ
इस कारण अंग्रेजी अधिकारी व्हीलर कानपुर छोड़कर भागना चाहा पर नाना साहब ने वापस व्हीलर पर हमला किया
व्हीलर के साथ उनके साथी, बच्चे और औरतें भी थी इसी कारण नाना साहब ने व्हीलर के साथ औरतों और बच्चों को जाने दिया
- शक्ति चौरा घाट से व्हीलर इलाहाबाद की तरफ जाने की इच्छा जाहिर करता है
- 27 जून को व्हीलर को जाने के लिए नाना साहब ने 40 नावों की व्यवस्था की थी
- नाना साहब ने उन्हें अपना हथियार भी साथ ले जाने की अनुमति दे दी
- नाना साहब ने हरदेव मल्लाह ,जो 40 नामों का रक्षक था, व्हीलर की सेवा में उसे नियुक्त किया
इसी दौरान अचानक गोलियों की आवाज सुनाई देने लगती है, गोली कौन चला रहा था पता नहीं चल रहा था अचानक दोनों तरफ से गोली चलने लगती है, नतीज नरसंहार के रूप में बदल जाता है
- गंगा नदी का रंग लाल हो जाता है
- इसके बाद और तात्या टोपे ने दूसरी बंगाल कैवेलरी को आदेश दिया कि स्थिति को संभाले
- नाना साहब अभी भी दिल्ली से काफी दूर कानपुर में ही है
- कानपुर में जो महिला और बच्चे बच गए उन्हें लेकर व्हीलर सवादा हाउस या बीवी घर पहुंचता है
- 27 जून 1857 को व्हीलर ने आत्मसमर्पण कर दिया
इसके बाद नाना साहब ने अपने आपको स्वतंत्रता और बहादुर शाह जफर का गवर्नर घोषित कर दिया